कोरोना संकट की घड़ी में 19 वर्षों के बाद झारखंड अपने युवा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अगुवाई में नवनिर्माण की ओर अग्रसरित

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झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा है, सरकार की कोशिश होगी कोरोना संकट को लेकर घर लौटने वाले मजदूरों को वापस न जाना पड़े।अभी करीब चार लाख लोगों ने झारखंड सरकार के प्रवासी मजदूर वाले एप में रजिस्ट्रेशन कराया है।दो लाख से अधिक लोग पैदल व अन्य साधनों से बिना रजिस्ट्रेशन वापस आ चुके हैं। जबकि एक लाख से अधिक लोगो को सरकार के प्रयास से भी वापस लाया गया है दूसरी ओर प्रवासी मजदूरों को लेकर कोई विश्वसनीय डाटा नहीं है, फिर भी एक अनुमान के अनुसार झारखंड के लगभग नौ से दस लाख लोग मजदूरी करने के लिये अन्य राज्यों में जाते हैं।

झारखंड की कुल आबादी सवा तीन करोड़ के करीब है। मतलब करीब साढ़े तीन प्रतिशत लोग रोजगार के लिये अन्य राज्यों पर निर्भर हैं।झारखंड के इन दस लाख लोगों को रोजगार के लिये बाहर नहीं जाना पड़े, इससे पहले जरूरी है सोचें कि पलायन का कारण क्या है ? झारखंड की अकूत खनिज संपदा और बड़े उद्योग झारखंडियों को रोजगार देने में विफल रहे हैं। जबकि इसके कारण झारखंडियों का जल जंगल और जमीन पर आधारित आधार से मरहूम होना पड़ा।

आजादी के पहले से ही विस्थापन झारखंड की एक बड़ी समस्या रही है।आजादी के बाद भी इसमें कोई फर्क नहीं पड़ा।

ये क्यों हुआ, केसे हुआ…. अलग से चर्चा का विषय है।

झारखंड बनने के बाद भी राज्य सरकार ने इस मुतल्लिक कोई कदम नहीं उठाया। बल्कि पिछली सरकार ने तो स्किल डेवलपमेंट के नाम पर अन्य राज्यों में लेबर सप्लाई का काम किया और इसके लिये पूर्ववर्ती भाजपा रघुवर दास की सरकार ने अपनी छवि अच्छी दिखाने के लिए झारखंड ही नही पूरे देश में पोस्टर बैनरों मिडिया विज्ञापन के मार्फ़त पैसों को पानी की तरह बहाया अपनी पीठ भी ठोंकी गिनीज बुक में अपना नाम भी दर्ज कराया जिसका भयावह परिणाम आज सबके सामने है ।

कोरोना संकट से स्थितियां बदली हैं। हर प्रवासी मजदूर वापस आना चाहता है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी बड़ी घोषणा की है – झारखंड के मजदूरों को वापस नहीं जाना पड़ेगा सभी को रोजगार उप्लब्ध कराए जायेंगे।अगर ऐसा होता है तो झारखंड में एक बड़ी क्रांती होगी। उद्योग धंधों के विकास के साथ बृहद रूप में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएंगे अगर ऐसा होता है मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी इच्छाशक्ति में सफल हो जाते हैं तो झारखंड नवनिर्माण की ओर अग्रसर हो जाएगा

  • ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा के तहत सरकार कार्यों को बढ़ावा देने में लगी हुई है केंद्र सरकार से मनरेगा मजदूरी को लेकर झारखंड वासियों के हित में आवाज भी उठा चुकी हैं झारखंड सरकार अपने यहां कार्य कर रहे हैं मजदूरों को दैनिक वेतन में ₹300 से लेकर ₹500 तक रोजाना मजदूरी देना चाहती है
    19 वर्षों के बाद पहली बार किसी सरकार ने मनरेगा मजदूरों के दैनिक मजदूरी के बारे में सोचा है अगर अपने झारखंड राज्य में ही मजदूरी अच्छी मिलेगी तो लोग दूसरे राज्यों में पलायन नहीं करेंगे अच्छी नेक सोच के साथ युवा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आगे बढ़ रहे हैं और कार्यों को धरातल पर उतारने में सक्षम भी दिख रहे हैं जिसमें केंद्र सरकार का आर्थिक पैकेज का साथ अगर अच्छी तरह झारखंड सरकार को मिला तो फिर झारखंड में विकासशील झारखंड की नवनिर्माण की गाथा लिखी जाएगी करोना काल संकट के दौर से पूरे देश में अपने राज्य को उबारने वाले मुख्यमंत्रियों के लिस्ट में हेमंत सोरेन का नाम पहले पायदान पर होगा

आइए मनन करें, आज की परिस्थिति में इसके लिये सरकार के पास क्या क्या उपाय हो सकते हैं।

पहला तो है कृषि क्षेत्र! जो रोजगार का सबसे बड़ा क्षेत्र है। इसे लाभकारी बनाने के उपाय तलाशने और लागु करने होंगे। जिसमें बड़े-बड़े कंपनियों छोटे उद्योगों के साथ पशु पालन, मछली पालन मधुमक्खी पालन, तसर कीट पालन, लाह पालन आदि शामिल हैं।इससे संबंधित वेल्यु एडीशन से भी रोजगार सृजन हो सकता है।कृषि उत्पादों की मार्केटिंग व्यवस्था अपने आप में एक बड़ा क्षेत्र है जहां रोजगार के नाते अवसर बनेंगे।

दूसरा, हस्तकरघा, हस्तशिल्प और अन्य पारंपरिक विधाओं को पुनर्स्थापित करना होगा। कृषि के बाद ये दूसरा बड़ा क्षेत्र है जहां रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।यह क्षेत्र पिछली सरकार के हाथी उड़ाने जैसी नीतियों के कारण उपेक्षित रहा, और जो भी अवसर थे वे भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ गये।इन सबके साथ साथ राज्य की जो नींव है, खनिज और उस पर आधारित उद्योग, रोजगार के माध्यम हो सकते हैं। इनमें झारखंडियों के लिये रोजगार के अवसर बनाने होंगे। सरकार को नियोजन के नियमों में सख्ती लानी होगी। जिससे कि राज्य के लोगों को ही काम मिले।

यानि यह मामला सीधे सीधे राज्य में स्थानीय नीति से जुड़ता है। चाहे सरकारी नौकरी हो या प्राईवेट, झारखंड में झारखंडियों को नौकरी मिले, इस मूल अवधारणा पर नियमों को मजबूती देनी होगी।इसमें यह देखना जरूरी हो जाता है कि झारखंड की मौजूदा स्थानीय नीति इस पैमाने पर कितनी सही है…. अगर नहीं है तो उसे बदलने की जरूरत होगी।


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